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शुक्रवार, 25 सितंबर 2026

जाजपुर : इतिहास एवं संस्कृति Jajpur : Itihas evam Sanskriti

    जाजपुर: इतिहास एवं संस्कृति 

     © मनोजकुमार साहू

यह दास्तान कोरी कल्पना नहीं, बल्कि किस्सागोई ढंग से रचित दस्तावेज है। जिस पर भविष्य के भव्य भवनों की नींव रखी जाती है।

जब हम भारतीय उपमहाद्वीप के प्राचीन सांस्कृतिक परिदृश्य पर दृष्टि डालते हैं, तो कुछ चुनिंदा भूभाग ऐसे मिलते हैं जो केवल भौगोलिक इकाइयां नहीं, बल्कि सभ्यता के जीवंत हस्ताक्षर होते हैं। ओडिशा की पवित्र वैतरणी नदी पर बसा जाजपुर एक ऐसा ही गौरवशाली प्रभाग है। सदियों से यह स्थल ऋषि-मुनियों की तपोभूमि, बौद्ध दर्शन का केंद्र, शैव-शाक्त राजवंशों की राजधानी और अनूठी लोक संस्कृति का संगम स्थल रहा है।

जब कोई इतिहासकार, लेखक या शोधकर्ता इस माटी के कण-कण को टटोलता है, तो उसे यहाँ पाषाण युग के मौन अवशेषों से लेकर बौद्ध विहारों के गुंजायमान मंत्र और आधुनिक औद्योगिक कल-कारखानों की अटूट निरंतरता सुनाई देती है।

यह लेख ‘जाजपुर: इतिहास एवं संस्कृति’ इसी ऐतिहासिक यात्रा का प्रारंभिक दस्तावेज है।

इसमें जाजपुर के पौराणिक गर्भगृह से लेकर इतिहास, संस्कृति, कला, राजनीति, स्वतंत्रता आंदोलन आदि को पिरोने की कोशिश की गई है। आइए, इस वैचारिक और सांस्कृतिक अनुष्ठान में सहभागी बनकर जाजपुर के अतीत के गौरव को महसूस करें तथा जन-जन तक पहुँचाने का संकल्प लें।

भौगोलिक अवस्थिति - भौगोलिक स्थिति इसे प्राकृतिक रूप और औद्योगिक दृष्टि से एक अत्यंत महत्वपूर्ण क्षेत्र बनाती है। इसके उत्तर दिशा में भद्रक और केंदुझर (क्योंझर), दक्षिण में कटक और जगतसिंहपुर, पूर्व में केंद्रापड़ा और भद्रक जिला तथा पश्चिम दिशा में ढेंकानाल जिले की सीमाएँ लगी हैं।

इसकी प्रमुख नदी वैतरणी और खरसुआँ तथा ब्राह्मणी हैं, जिनकी भौगोलिक, ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व है।

वैतरणी नदी को जाजपुर की जीवनरेखा मानी जाती है। इसके अतिरिक्त ब्राह्मणी और खरसुआँ नदियाँ यहाँ की मिट्टी को ज्यादा उपजाऊ बनाती हैं।

औद्योगिक दृष्टि से जाजपुर का कलिंगनगर क्षेत्र को भारत की स्टील राजधानी कही जाती है।

पौराणिक एवं ऐतिहासिक पृष्ठभूमि महाभारत, ब्रह्म पुराण और वायु पुराण में वैतरणी के तट पर स्थित इस क्षेत्र को अत्यंत पावन तीर्थ कहा गया है। पौराणिक विवेचना और लोककथानुसार महाभारत युद्ध में जब दुर्योधन और भीम में गदा युद्ध हुआ तब दुर्योधन ने जाजपुर रोड के निकट 'व्यास सरोवर' में जान बचाने के लिए छिपा था। किंवदंती है कि पांडवों ने अपने वनवास के समय जाजपुर में प्रवास किया था। वैतरणी नदी के दशाश्वमेध घाट, नाभिगया पर पिंडदान और तर्पण करने की बहुत पुरानी है।

इतिहास प्रसिद्ध सोमवंशी राजा जजाति केशरी द्वितीय ने बिरजाक्षेत्र स्थित वैतरणी नदी के तट पर दशाश्वमेध यज्ञ किया था। तथा उत्तर भारत से विद्वान ब्राह्मणों को आमंत्रित कर यहाँ बसाने का कार्य किया था। इसी यज्ञ के कारण उस स्थान का नाम 'यज्ञपुर' पड़ा, जो कालांतर में जाजपुर हो गया। इसी कालखंड में 51 शक्तिपीठों में एक शक्तिपीठ माँ बिरजा मंदिर का निर्माण हुआ।


बौद्ध त्रिरत्न जाजपुर न केवल हिंदू संस्कृति का केंद्र था ऐसा नहीं बौद्ध मठ, बौद्ध धम्म का अत्यंत गौरवशाली वैश्विक केंद्र रहा। यहाँ के रत्नगिरि (रत्नगिरी), उदयगिरि और ललितगिरि (ललितगिरि) को डायमंड ट्रायंगल कहा जाता है।

रत्नगिरि: यहाँ नालंदा और तक्षशिला के तर्ज पर एक विशाल बौद्ध विश्वविद्यालय और भव्य स्तूप के अवशेष मिले हैं, जो शिक्षा का प्रमुख केंद्र हुआ करता था।

उदयगिरि और ललितगिरि में पुरातात्विक उत्खनन में बहुत सारे बौद्ध विहार, ध्यान मुद्रा में बुद्ध की प्रतिमाएँ अवशेष और सैकड़ों प्राचीन मुहरें मिले हैं।


रत्नगिरि (रत्नगिरी) को छठी से बारहवीं शताब्दी में सबसे प्रमुख और भव्य बौद्ध ज्ञान तथा दर्शन का महा-विश्वविद्यालय माना जाता था। यहाँ एक विशाल मुख्य स्तूप स्थित है, जिसके चारों तरफ सैकड़ों छोटे-छोटे प्रार्थना स्तूप बने हुए हैं। इन सबकी वास्तु-कला व पत्थरों पर उकेरी गई नक्काशी अद्वितीय हैं।

यहाँ के बौद्ध विहार की वास्तुकला दो मंजिला है। जिसके केंद्र में एक खुला प्रांगण और उसके चारों ओर बौद्ध भिक्षुओं के लिए कक्ष बने हैं। इसके प्रवेश द्वार पर बनी उत्कृष्ट कलाकृतियाँ तथा विभिन्न भंगिमाओं में बनी पत्थर की मूर्तियाँ कलिंग वास्तुकला का बेहतरीन नमूने हैं। उदयगिरि में चट्टानों और मूर्तियों पर कई प्राचीन दुर्लभ शिलालेख मिले हैं, जो उस समय के बौद्ध धम्म-दर्शन-शिक्षा और बौद्ध संघों के इतिहास पर प्रकाश डालते हैं।

आज यह स्थल सिर्फ खंडहर नहीं बल्कि भारत की प्राचीन बौद्ध विरासत, वास्तुकला और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बौद्ध धम्म-दर्शन के प्रचार-प्रसार के जीता-जागता प्रमाण हैं।

कला, लोक संस्कृति और हस्तशिल्प: आज भी बड़ी संख्या में यहाँ पत्थर की बनी मूर्तियाँ इसका समृद्ध प्रस्तर शिल्प का प्रमाण हैं।

यहाँ पर तसर सिल्क की साड़ियाँ बनाई जाती है। पहले बड़ी संख्या में साड़ियाँ बनाती थी, अब छिटपुट हथ-करघे चल रहे हैं। फिर भी सिल्क साड़ियों की बेहतरीन डिजाइन और गुणवत्ता बरकरार हैं।

यहाँ के कुछ पारंपरिक लोक-नृत्य और कलाओं में पाला और दासकाठिया व घोड़ानाच प्रसिद्ध हैं।

(पाला में विभिन्न पौराणिक कथाओं को गायन, संगीत, नृत्य, अभिनय के माध्यम से प्रदर्शित किया जाता है। इसमें मृदंगम, झाँझ, मंजीरे का उपयोग वाद्य यंत्रों के रूप में होते हैं। दासकाठिया में दो कलाकार होते हैं, जो लकड़ी के दो-दो टुकड़े दोनों हाथों में पकड़ कर एक ताल ध्वनि निकालते हुए तथा पौराणिक कथा सुनाते हैं।)

घोड़ा नाच (नृत्य) केवट (मछुआरा) लोग बाँस की लंबी पतली सींकों से ढाँचा (फ्रेम) बनाकर उस पर रंगबिरंगे कपड़ा चढ़ाकर घोड़ा बनाते हैं, उस आकृति के भीतर (बीचों-बीच) घुस कर नाचते हैं। इसमें एक जोड़ी घोड़े (बाँस से बने हुए) नाचते हैं। यह त्मयोहार चैत्र हीने में होता है।

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