•••• तड़प ••••
कवि : मनोजकुमार साहु
दान - खैरात - चढ़ावा
लेता है क्या भगवान ?
शायद घूसखोर उसे
समझ बैठे हो
इसीलिए काम देख कर
दाम तय करते हो ।
गली - मुहल्ले - शहरों में
दाने दाने को तरसते
फटे मैले चिथड़न लपेटे
भूख को तकदीर समझ कर
तंग गलियों में रहने वालों को
कभी अपना समझ कर देखा है ?
मासूम - मासूम नादान चेहरे
हड्डियों के ढाँचे
प्यासी पथराई आँखें
जब हाहाकार मचाते
दान - खैरात - चढ़ावा
ईश्वर खरीदने निकले !
तुम्हें क्या पता ?
दीन जनों में ही ईश्वर बसते
अरे पागलो !
खुद प्यासा बनके
एक बूँद पानी से




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