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गुरुवार, 18 अक्टूबर 2018

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  ••••  तड़प ••••         

                      कवि  : मनोजकुमार  साहु   

 दान - खैरात - चढ़ावा 
 लेता है क्या भगवान ?
 शायद घूसखोर उसे 
 समझ बैठे हो 
 इसीलिए काम देख कर
 दाम तय करते हो ।

 गली - मुहल्ले - शहरों में 
 दाने दाने को तरसते 
 फटे मैले चिथड़न लपेटे 
 भूख को तकदीर समझ कर
 तंग गलियों में रहने वालों को
 कभी अपना समझ कर देखा है ?

 मासूम - मासूम नादान चेहरे
 हड्डियों के ढाँचे 
 प्यासी पथराई आँखें 
 जब हाहाकार मचाते
 दान - खैरात - चढ़ावा
 सब धूल बन जाते।

 भूखों नंगों जरूरतमंदों को छोड़
 ईश्वर खरीदने निकले !
 तुम्हें क्या पता ?
 दीन जनों में ही ईश्वर बसते
 अरे पागलो !
 खुद प्यासा बनके 
 एक बूँद पानी से 
 समंदर की प्यास बुझाने निकले।

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