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गुरुवार, 18 अक्टूबर 2018

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                  प्रियतमा (3)

                  कवि मनोज कुमार साहु

जग भर घूम घूम मैं ,
 ढूँढता रहा प्रेम की परिभाषा;
चारों और खाली स्याह अंधकार
 प्रताड़ना छल कपट निराशा ।
प्रेम के बिना जीना भी क्या जीना ?
आस लगाकर तेरे ठौर आया
 प्रेमराई में शरण दे दे ,प्रेम गुलाल से
रंगीन कर गुलाबी प्रियतमा ।।

तर्पण

                   तर्पण                  ©️  मनोज कुमार साहु  ​जो वतन के वास्ते अपनी जाँ न्यौछावर कर गए, हँसते-हँसते मातृभूमि...