" बेवफा " शायरी
मनोजकुमार साहु
{ सौदा }
हाँ तू भी गुनहगार है
मोहब्बत में सौदा नहीं होता
ये तुझे पता नहीं है ?
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अरे दुनिया सच्चे आशिक को हरा नहीं पाई है{ बेवफा }
न प्यार के दुश्मन उसे रुला पाए हैं
जिसकी महबूबा बेवफा हो
उसे भी रोना नहीं चाहिए ।।
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{ शायर }
मनोज ! क्यों आए हमें शर्म
प्यार तो गुनाह भी नहीं है
हर चोट खाया हुआ आशिक
शायर जरूर बन जाता है ।।
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{ यकीन }
हम तो हँसते हैं खुद पर
और तेरी नादानी पर
कसूर तो हमने की है
यकीन करके तुझ पर ।।
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{ बेवफ़ाई }
कहते हैं उम्र बढ़ते ही
आईना भी बेवफा हो जाता है
और बेवफाई जिस इंसान की फितरत हो
वह कभी भी हाथ छोड़ सकता है ।।
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{ इश्क़ मिज़ाजी - इश्क़ हकीकी }
हर बार गोताखोर
मोतियाँ नहीं ला पाता है
इश्क मिजाजी बहुत देखे हैं हमने
इश्क हकीकी देखने को नहीं मिलता है ।।
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{ लूट }
चाहते तो हम भी तुझे कब से लूट लेते
लेकिन तुझ जैसी नहीं हमारी फितरत
लूट कर तू फिर भी कंगाल
और लुटा कर हम अब भी बादशाह हैं ।।

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