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गुरुवार, 25 नवंबर 2021

क्या हासिल कर लिए तुम

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मुहब्बत में चोट दे कर 
क्या हासिल कर लिए तुम, 
अपने दिल में झाँक जालिम
क्या हासिल कर लिए तुम, 
बेवफाई का घाव दे कर मुझे 
क्या हासिल कर लिए तुम।
        ©️ मनोजकुमार

रविवार, 21 फ़रवरी 2021

लाख टके की बात



पहले चाँदी के चम्मच होते थे
आजकल चमचों की चाँदी है। 

पहले घर की मुर्गी दाल बराबर होती थी 
अब 1 किलो दाल से 3किलो मुर्गी मिलती है। 

कुछ लोग नेताओं की चापलूसी को देश प्रेम 
और सच बोलने को गद्दारी समझ बैठे हैं।


तुम्हें सुंदरता से प्रेम है तो
तुम जरूर एक अच्छे इंसान हो
इसका मतलब यह नहीं कि
तुम कमजोरों पर जुल्म करो

©️ मनोज कुमार 

रविवार, 20 सितंबर 2020

तुम कितने झूठे हो ( ©️ मनोजकुमार साहु )

खामोशी से क्यों रौंदोगे हमें 
तुम्हारे पास हमारी दी हुई ताकत जो है ।
वाह वाह वाह!
तुम्हारी दरियादिली की सब कायल हैं ।
क्योंकि तुम शोषण करते थे कल तक 
आज तुम्हारे लस्कर हमारे लिए 
बुलवाये गये हैं ।

जबतक तुम्हारे पास है तख्त
अपना गरूर मत छोडना
तुम्हारी दाद देता हूँ- नाटकवाजी के लिए
 कोड़े बरसाते हुए 
मगरमच्छ के आँसू के लिए 

हम भी कितने पागल थे 
तुम पर भरोसा करके 
खुद का सर्वनाश कर लिए 
तुम भी कितने झूठे हो 
तुम्हारी हर कुचाल को 
हम समझ चुके हैं 
तुम्हारे रसगुल्ले में 
ना रस हे ना मिठास है 
उसमें सिर्फ षडयंत्र का जमालघोटा है 

जो करते हैं तुम्हारी चापलूसी 
वो भी समझ चुके हैं 
तुम्हारे हाथ के चाबुक 
उन पर पडने वाले हैं ।

©️मनोज कुमार

गुरुवार, 30 अप्रैल 2020

शायरी मनोजकुमार साहु की


         

शायर - मनोज कुमार साहु 

              बेईमानी

  बेईमानी की चमक पर न इतराना जालिम
  क्या पता ?
  कब खुल जाए
  बेईमान की कलई।

                बेवफा 

  नसीब नहीं होती,
  बेवफा को घर वापसी ।
  यही तो सजा है,
  बेवफा को कुदरत की।

               एहसान फरामोश

  कम अक़्ल से दोस्ती में
  कभी ख़ाक नहीं हुआ कोई ।
  एहसान फरामोश से दोस्ती
  जल्दी तोड़ देने में भलाई ।

               आहें 

  जिसने भी सुना दर्द-ए-दास्तान मेरे
  आँखों में आँसू ,होंठों पर आहें निकले उसके

                बीमारी 

  रईसों को लगती हैं अनगिनत बीमारी,
  उनके नाम कयी हैं।
  गरीबों को बस एक बीमारी,
  जिसका नाम भूख है।

               इश्क़ 

  कमसिन उम्र की इश्क़ को,
  दबोच देने को आमादा जमाना रहती है ।
  बड़ी उम्र की इश्क़ को,
  जमाना बदनाम क्यों करती है ?

               मौत 

  अफ़सोस नहीं है हमे मौत की,
  मौत तो साया है जिंदगी की।
  ख्वाहिश थी,
  माशूक़ा के बाहो में मरने की ।

              हौसला 

  ना-उमीदी किस चिड़िया का नाम है ?
  बुलंद हौसले वालों को यह पूछना गुस्ताखी है।

                इल्म

  शुक्रिया ऐ बेवफ़ा तुने जो घाव दिए
  बेवफाई से जिंदगी के इल्म दिए।

  ©️ मनोज कुमार साहु 

सोमवार, 20 जनवरी 2020


                जिंदगी 

        कवि मनोजकुमार साहु 

 

 ये जिंदगी भी धूप-छाँव का खेल है
 रेत पर पड़ी हुई उस लकीरों के समान
 जो साहिल पर देर तक नहीं टिकते,
 जिंदगी और मौत के बीच ;
 चंद समय के फासले।
 सुनहरी भी स्याह भी है जिंदगी
 लेकिन बड़ी दिलचस्प है,
 जिसके लिए रोते थे तुम कल
 आज शायद वह सब बेमानी है।
 हर किसी की जिंदगी
 एक मशहूर कहानी है।
       


बुधवार, 4 दिसंबर 2019

लोकतंत्र में जंगलराज

               

                  लोकतंत्र में जंगलराज 


              कवि मनोजकुमार साहु 



 अब लोकतंत्र में
 जंगलराज चल रहा है।
 क्यों कहता हूं ऐसा ?
 सब को सोचनी चाहिए।
 जंगल में जो होता है
 शिकारी और शिकार का-
 वही खेल चल रहा है
 अब लोकतंत्र में
 जंगलराज चल रहा है।

 सत्ता में जब होती हैं
 राजनैतिक पार्टियाँ
 तब विपक्ष जैसा बर्ताव
 बस सत्ताधारिओं का
 विपक्ष का कंठ रोध करना
 रह गया है एक काम।
 शिकारी और शिकार का
 वही खेल चल रहा है
 अब लोकतंत्र में
 जंगलराज चल रहा है।

 सरकार और विपक्षी पार्टियाँ
 रोजगार, महंगाई, अर्थनीति पर
 खामोश क्यों बैठी हैं?
 मुद्दे अब आम जनता की नहीं
 राम - रहीम के हैं।
 लोकतंत्र के मंदिर में
 बापू के कातिल को
 देश प्रेमी बताया जाता है-
 इसीलिए क्यों न कहूँ ?
 अब लोकतंत्र में
 जंगलराज चल रहा है।

 पहले तो सरकारें खान, खेल, रेल घोटाले करती थी।
 अब तो सरकार
 आम आदमी की जेब से
 हाथ डाल कर निकाल रही है पैसे।
 शिकारी सरकार,
 शिकार बेबस जनता।
 शिकारी और शिकार का
 खेल बदस्तूर चल रहा है
 अब लोकतंत्र में जंगलराज चल रहा है।


 नौजवान पूछ रहे हैं-
 नौकरी कहाँ हैं?
 जवाब में मंत्री जी कहते हैं
 देश में काबिले लोगों की कमी हैं
 जब पूछा जाता है-
 उत्पादन वृद्धि दर पर
 सत्ता पक्ष कह रहा है
 इस आंकड़े को बंद कराएँगे।
 संसद में-
 शिकारी और शिकार का
 खेल चल रहा है
 अब लोकतंत्र में
 जंगलराज चल रहा है

 आजकल के टीवी डिबेट में
 पाकिस्तान और कब्रिस्तान का
 ज़िक्र खूब हो रहा है !
 ट्विटर, फेसबुक, सोशल मीडिया पर
 गालियां खूब लिखी जा रही है।
 इक्का-दुक्का मीडिया को छोड़कर
 हर मीडिया,
 जनता को बेवकूफ बना रही है।
 दुष्कर्म - महिला उत्पीड़न जारी है,
 बलात्कारी सरकारी रोटियाँ तोड़ रहा है।
 लोकतंत्र में जंगलराज चल रहा है।


 विशेष: इस कविता में सिर्फ और सिर्फ राजनीतिक पार्टियों पर तंज है। मैं लोकतंत्र, तिरंगा झंडा, भारतीय संविधान और कानून पर सच्ची श्रद्धा रखता हूँ। भारत माता की जय🇮🇳 जय भारत के संविधान 🇮🇳तिरंगा झंडा की जय

मंगलवार, 5 नवंबर 2019



दुश्मनी अगर मुझसे थी, खंजर घोंप देती सीने में
मेरे दिल के टुकड़े करके क्या मिला तुझे रुलाने में?

                 ©️मनोज कुमार 

रविवार, 3 नवंबर 2019

हिन्दुस्तानी

सच्चे हिंदुस्तानी को
कोई बरगला नहीं सकता
धर्म-मज़हब के नाम पर
हमें कोई लड़ा नहीं सकता
जो लड़ता है मज़हब के नाम
वह सच्चा हिंदुस्तानी हो नहीं सकता

हम लड़ेंगे बेशक़ उससे
जो हम में फूट डालने की कोशिश करेगा
मज़हब है मेरा हिंदुस्तानी
तिरंगे की आन वान शान के लिए
 सर कटाने में हिंदुस्तान पीछे नहीं रह सकता

संविधान है मेरा भगवान
इसके एक एक शब्द को
अमल में लाएँगे हम
इससे हमें कोई डिगा नहीं सकता




शनिवार, 2 नवंबर 2019

झूठ / ©️मनोजकुमार

     

                 झूठ 

        कवि मनोजकुमार साहु 


   झूठ हर पाप का बीज है 
   दुनिया में सिर्फ इंसान ही झूठ बोलता है
   दंगा, दलाली, हत्या, धोखा, चोरी, दुष्कर्म
   घोटाले,आलस्य, लालच
   जितने नीच कृत्य होतें हैं
   सबकी जड़ में झूठ होता है ।

   झूठ एक लत है
   जो इंसान को शैतान बनाने में
   वक़्त नहीं लगाता ।
   हर फसाद की जड़
   झूठ होता है ।

         ©️मनोज कुमार 

गुरुवार, 5 सितंबर 2019

शरशय्या

             

                                शरशय्या 




                           मनोजकुमार साहु 


      भीष्म को भला कौन मार सकता है?
      द्वापर के कुरुक्षेत्र में,
      भीष्म जब शरशय्या पर
      पड़े - पड़े तड़पते हुए देखे गए थे।
      तब अर्जुन के कारण नहीं
      खुद भीष्म ने शरशय्या को
      आलिंगन किए थे।

      जब पांचाली का वस्त्रहरण हुआ
      तब भीष्म प्रतिवाद में
      कान भी नहीं हिलाए थे।
      तब से धिक्कारती थी
      उनकी अंतरात्मा
      उसी की सजा
      खुद भुगत रहे थे।
      गंगा पुत्र पड़े - पड़े
      युद्ध भूमि की
      शरशय्या पर
      प्रायश्चित की अग्नि में
      तड़प रहे थे।

      अन्याय करना - देखना - सहना
      घोर पाप है
      भीष्म अन्याय देख कर;
      चुप थे।
      उन्हें इतनी सजा!
      जो सर्वविदित है।

      जब देवव्रत न्याय चक्र से मुक्त नहीं-
      आज मनुष्य
      अन्याय के घोड़े पर
      सवार है।
      निरीह - पीड़ित - कमजोर को
      टाप तले रौंद रहा है।
      बही - खाते में अन्याय का
      हिसाब चालू है।
      हर पापी का बस
      घड़ा भरना बाकी है
      शरशय्या तो बिछी है
      बस दुष्टों को
      वहाँ लेटना बाकी है।
      न्याय चक्र की अंतिम गति
      अन्यायी की अंतिम गति
      शरशय्या है।

सोमवार, 19 अगस्त 2019

©️ Manoj Kumar

            

                     बेजान आईना 




        बेजान आईने में क्या रखा है?
        हमारी आँखों में झाँक लिया कर।
        टूटने का डर तो बिल्कुल नहीं है,
        हाँ डूबने का खतरा जरूर है।

                            ©️ मनोज कुमार 

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                   गुलाम



          खुद बिकने वाले बिकते हैं
          सदियों से गुलामों की तरह।
          जिनकी जमीर मर गई है
          छोड़ दो उनके बारे में सोचना।
          रहने दो उन्हें गुलामों की तरह।

                              ©️ मनोज कुमार

रविवार, 4 अगस्त 2019

गुस्ताखी मत करना

                 गुस्ताखी मत करना


कवि मनोज कुमार साहु 



   भले ही अंधेरे में रहो ताउम्र
   रोशनी छीनने की
   गुस्ताखी मत करना।
   जो है ईमान वाला
   उसे दौलत से तोलने की
   गुस्ताखी मत करना।
   मिट गए हैं कितने दौलत वाले,
   मिट जाते हैं
   इमान वालों का वजूद मिटाने वाले।
                                         
                                      ©️मनोज कुमार

                           दामन


        कवि मनोज कुमार साहु


    तूने खाई थी कसमें,
    ताउम्र साथ चलने का
    तूने बेवफाई का दामन बचाए रखा
    हमने वफा का दामन बेदाग रखा।

                                     ©️मनोजकुमार 

                           वादा


 कवि मनोज कुमार साहु


  जो वादा करते जिंदगी भर के लिए
  तुझ जैसा राहों में, साथ छोड़ा नहीं करते।
  लेकिन हाथ पकड़ने के हमने कभी वादे किए थे
  जिंदगी भर वादा नहीं भूले हैं ।

                                           ©️मनोज कुमार

शनिवार, 20 जुलाई 2019

चापलूसी (©️ मनोजकुमार साहु )

                     

                      चापलूसी

        

           ©️ मनोजकुमार साहु


    हमें चापलूसी करना नहीं आता।
    कद्दावरों के कुकर्म पर
    पर्दा डालना नहीं आता ;
    हमें पैसों वालों की गलती पर
    ठहाके लगाकर,
    सिर झुका कर,
    तलवे चाटते हुए
    चापलूसी करना नहीं आता।

बुधवार, 17 जुलाई 2019

Shaayaree

 


शायरी 


कवि मनोजकुमार साहु 

                      ⚪सीप और मोती⚪



        मोहब्बत करना है तो
        फूल या भौंरा जैसे ना करो
        मोहब्बत करना है तो
        सीप और मोती जैसे करो
        भौंरा फूल से मिठास लेकर
        दूर हो जाता है 
        सीप मोती को
        अपने सीने में छुपा कर रखता है
                         ●

                      सिद्दत 😊

        वह मोहब्बत भी क्या 
        जो सिद्दत से निभाया ना जए
        वह नफ़रत भी भी क्या 
        जो सिद्दत से निभाया ना जए 
        मोहब्बत-नफ़रत, दोस्ती-दुश्मनी
        सिद्दत के सिवा सब बेकार 
                         ●

                       तड़प 



        हमसे जो दिल लगाएगा
        वह भी तड़पेगा
        हमसे जो दुश्मनी करेगा
        वह भी तड़पेगा
        फ़र्क सिर्फ़ इतना होगा 
        मोहब्बत और दुश्मनी में 
        कोई हमें देखने के लिए तड़पेंगे
        कोई देख कर तड़पेगा
                      ●
       

                   ए नर्गिस !


       दर्द पर इतना भी ना लगा मरहम 
       ए नर्गिस मस्ताना ! 
       कहीं हम सीख ना ले चोट खाना
       और तू मरहम लगाना
                      ●
        
         
                 

शनिवार, 18 मई 2019

priyatama


                           कवि मनोजकुमार साहु

 

      प्रियतमा {25}

      एक एक करके
      अमूल्य रतन को
      बिना छुए निहारता रहा
      दस्यु बनकर
      लूटने चला था
      खुद में लूट वहाँ गया
      कश्ती डूबी कामवासना का
      मेरी जान बचा ली प्रियतमा 
          -  ● -

     प्रियतमा {26}


      अस्त्र त्याग कर
      योगी बन मजनू 
      शास्त्र पकड़ना भूल गया
      पुजारी बन तेरे अधर का
      आधारामृत पीने की देख तृष्णा
      खुद तू बनके योगिन 
      मधु पान कराती गई
      मासूम नादान प्रियतमा
            - ● -

     प्रियतमा {27}


      मधु के साथ - साथ
      अधरराग भी
      पीता गया दिवाना तेरा
      इतने में कुछ ना बिगड़ता
      क्यों तू इश्क फरमा बैठी 
      आशिक बना अब इश्क मिजाजी
      पागल प्रेमी को अकेली
      संभाल पाएगी प्रियतमा
                - ● -

बुधवार, 15 मई 2019

shayari


                      मनोज कुमार साहु
         
                           ● शायरी ●

                 कसम

 कसम है तुझे तेरी बेवफाई की
 कब्र पर मेरे एक बूँद आँसू ना बहाएगी ।

                ना आना

 पनघट में देखा था तुझे पहली मर्तबा
 मेरी मौत की खबर से मरघट ना आना महबूबा ।

                 धूल 

 तू भी धूल है
 मैं भी धूल हूँ
 फर्क सिर्फ इतना है
 तू खुद को हिमालय समझता है
 मैं खुद को धूल समझता हूँ

शनिवार, 20 अप्रैल 2019

तेरी चाहत है इतनी तुझे क्या बताऊँ


तेरी चाहत है इतनी तुझे क्या बताऊँ

                      कवि मनोज कुमार साहू


  तेरी चाहत है इतनी तुझे क्या बताऊँ ?

  इजाजत ले लूँ सोचता हूँ हमेशा

  लेकिन तेरी इंकार के डर से

  या कहीं तू रूठ ना जाए

  इजहार नहीं कर पाता हूँ

  कहीं दूर ना चली जाए तू मुझसे

  तेरी फिक्र करता रहता हूँ

 और किसी की ना हो जाए तू

  डर के साए में हमेशा रहता हूँ

  तेरी चाहत है इतनी तुझे क्या बताऊँ ?
                    --●--

सलाम


              ● सलाम ● 

                          कवि मनोजकुमार साहु 


   घूमता है तेरा बेटा हाथ में लिए कफन 
   करता है शाम - ओ - सहर तेरा ही वंदन
   सच्चाई की राह पर चलने वालों को सलाम 
   तेरा बेटा किसानों को सलाम 
   तेरे लिए बलिदान को सदा हम तैयार 
   करते हैं तेरे कण-कण को सलाम
   मेरी माता पूज्य माता भारत माता सलाम 
   हर युग में जनम लेकर बार-बार 
   बनके गांधी सुभाष देंगे बलिदान 
   बॉर्डर पर खड़े जवान को सलाम
   खून देकर रखेंगे हम हमेशा तेरा मान 
   माता तुझे सलाम कोटि-कोटि सलाम 
   मेरी माता - पूज्य माता - 
   भारत माता सलाम
                          --●--

शुक्रवार, 19 अप्रैल 2019

खुदा पर एतबार


                    ● खुदा पर एतबार ●

                          कवि : मनोज कुमार साहु


    मैं कल तक खुदा पर एतबार नहीं करता था 

    मैं भी कल तक नास्तिक ही था 

    जब देखा तुझे नाज़नीन 

    में भी तुझे पाने के लिए 

    खुदा की इबादत करने लगा

    कमल , पके अनार के दाने को

    कुदरत की देन समझता था 

    तेरे मासूम चेहरे को देखकर

    कुदरत भी खुदा की देन है यकीन हो गया 

    तेरी प्यारी सी आँखों को खूबसूरत

    खुदा ही बनाया है, यकीन हो गया

    जो था नास्तिक कल तक 

    आज इश्क मजाजी से इश्क हकीकी 

    और खुदा की शागिर्द बन गया

    तू इतनी हसीन है क्या बताऊँ

    तेरी मासूमियत खुदा की ही देन है

    जिसे खुदा पर ऐतबार नहीं था

    वह खुदा का इबादतगार बन गया

    मुझे खुदा पर एतबार हो गया 
                 --●--

सोमवार, 1 अप्रैल 2019

कटघरे में नेता जी

 

       कवि मनोजकुमार साहु 

     ● कटघरे में नेता जी ● 

   
     क्यों ना खड़ा करूं तुम्हें
     कटघरे में नेताजी ?
     जितने दंगे होते हैं देश में
     हिंदू मुसलमान नफरत
     तुम्हारे तो किए धरे हैं।
     वोट बचाना वोट जुटाना
     और चुनाव जीतना अनैतिक उपाय से
     फिर सत्ता पाना तुम्हारे खून में है तो
     क्यों ना खड़ा करूं तुम्हें
     कटघरे में नेताजी ?

     झूठे वादे झूठे आरोप का बसेरा
     है तुम्हारे दिमाग में।
     लोगों को डरा, बरगला कर
     वोट मांगना तुम्हारी आदत है।
     चुनाव आते ही रंग बदलना,
     जनता के आगे दुम हिलाना
     जीत जाने के बाद आँखें तरेरना ;
     हमेशा वादाखिलाफी के लिए
     क्यों ना खड़ा करूं तुम्हें
     कटघरे में नेताजी ?

     सत्ता में होते हो तुम तो
     विपक्ष जैसा बर्ताव
     विपक्ष में होते हो तो
     कुर्सी के लिए जनता का हमदर्द
     दंगाई - लूटेरा - बलात्कारियों को
     साथ लेकर क्यों घूमते हो नेताजी ?
     जिस पार्टी को कोसते थे दिन रात,
     आज उस दल में मलाई खाने
     खड़े हो तुम क्यों सबसे आगे ?
     नेता बनते ही साल भर में हजार रुपए तुम्हारे
     हो जाते हैं कई करोड़ कैसे ?
     जनता के टेक्स से मौज करते हो ।
     तो क्यों ना खड़ा करूं तुम्हें
     कटघरे में नेताजी ?

शुक्रवार, 29 मार्च 2019

Priyamanasam 22

                   कवि मनोज कुमार साहु

            ● प्रियतमा 22 ●

        घनेरी घनेरी जुल्फों तले
        उर पर आशिक सो गया
        मृदुल कोमल स्पर्श मात्र से
        चट्टान का मुंह खोला
        क्या बतलाऊं शब्द से उसे ?
        पत्थर मोम सा पिघला
        बंध गए दोनों अभेद्य बंधन में
        फूट फूट कर रो पड़ी प्रियतमा ।22।

           ● प्रियतमा ( 23 ) ●

        एक एक आँसू 
        मोती बन गए
        समेटता मैं उसे गया
        जितने बच गए
        दामन में बाँधा
        एक भी गिरने न दिया 
        आँसू के मोती सजाया दिल में 
        देख मुस्कुरा दी अल्हड़ प्रियतमा ।23।

             ● प्रियतमा 24 ●

        अपलक नयन से आशिक
        बुलाता रहा अपने आशियाना
        बाहों में आकर उसने
        खोल दी योवन का खजाना
        लूट लो सब कुछ मेरा
        सामने सब कुछ पाकर 
        क्या लूट करता प्रितम ?
        पहले से संपूर्ण समर्पित प्रियतमा ।33।
                           ●

सोमवार, 25 मार्च 2019

दकियानूसी सोच

              ●  दकियानूसी सोच ●
 

            कवि मनोजकुमार साहु 


 तुम गरीब हो तो टपोरी हो
 तुम गरीब हो तो मूर्ख हो
 तुम गरीब हो तो बेईमान हो
 तुम गरीब हो तो अज्ञानी हो
 तुम गरीब हो तो विश्वास के लायक नहीं हो
 तुम गरीब हो तो भरोसेमंद भी नहीं हो
 तुम गरीब हो तो चोर भी हो सकते हो
 तुम गरीब हो तो हंसी का पात्र हो
 तुम गरीब हो तो तुम में -
 विचार नाम की कोई चीज ही नहीं है
 तुम गरीब हो तो तुम्हें कोई पूछता भी नहीं
 तुम गरीब हो तो
 हंसी ठिठोली का पात्र भी हो
 तुम गरीब हो तो
 सुनहरे सपने भी नहीं देख सकते
 तुम गरीब हो तो
 अधिकार भी नहीं है समाज में
 ऐसा सोचते हैं कुछ दकियानूसी लोग




पसंद ह

● मुझे पसंद है ●


           कवि मनोजकुमार साहु 


  तेरे पैरों की लालिमा ,
  मात देती है पलाश की पंखुड़ियों को।
  तेरे होंठ को ,
  गुलाब के पंखुड़ियां तो नहीं कहूंगा
  लेकिन वह मात देते हैं गुलाबी गुलाल को।
  तेरी आँखे इतनी खूबसूरत है
  इसीलिए लग न जाए नजर किसी की
  काजल से उसे रंग दे।
  तेरी बिखरी बिखरी जुल्फों को
  पड़े रहने दे बेदर्दी से
  उसे मत सँवारना
  नशा ए शराब को भी मात देती हैं।
  ऐसे तू ठीक है - मुझे पसंद है।

सोमवार, 18 मार्च 2019

सोच समझ कर डालना बोट

      

                  कवि मनोज कुमार साहु


 सोच समझ कर डालना वोट
 नेता आएंगे जाएंगे,
 आते थे चले भी गए
 उनकी गुलामी करना छोड़ दो।
 सिर्फ नारा नहीं चाहिए हमें
 सन 47 से कितने नेता
 नारा थमा कर चले गए।
 लेकिन मुद्दा गरम है
 चुनावों में आज तक -
 कहते हैं राजनीति में,
 हर नेता को सिर्फ कुर्सी से मतलब है।
 मतलब परस्त नेता को वोट ना दो
 वादे पूरे नहीं हुए तो,
 उन्हें कभी वोट मत दो
 यही गुजारिश है।
 धोखा खाकर दोबारा ना डालना वोट
 करके यकीन उन पर
 पैसा दारू के बदले ना डालना वोट।
 वोट से मुंह मोड़ना भी देश हित में नहीं
 वादा जो पूरा करेगा
 डाल दो तुम उसको वोट
 सोच समझ कर डालना वोट।

गुरुवार, 14 मार्च 2019

Priyatama ( 19 )


              कवि : मनोज कुमार साहु 

                                    ओड़िशा


               प्रियतमा ( 19 )


     खींच ली माशूक के हाथ
     चूम - चूम के रखी उर पर
     पूर्ण हुआ शून्यता
     आंखें हुई बंद
     था दिल में बहूमान
     डर सिहरन प्रेम पुलक
     समर्पण भाव से अपने को समर्पित कर
     मोम की मूर्ति बन बैठे प्रियतमा ।


                 प्रियतमा ( 20 )


     कठोर कर - कोमल हृदय का मिलन
     धक - धक धड़कते रहे दो दिल
     जैसे मिलन नदी और समंदर का
     संयोग सुमन शबनम का
     परस्पर परस्पर उतावले बनने को
     प्यासे होंठ, भरा हुआ प्याला
     हाथ प्रियतम के
     जकड़ी धरती प्रियतमा

            प्रियतमा ( 21 )


    प्रियतम कैसे कर पाता दूर
    महसूस करा प्रिया की धड़कन
    जैसे हथेली के कान निकल आए
    और सुनता रहा मधुर से मधुर
    संगीत झंकार, व्यथा - उल्लास - पीड़ा
    प्रियतम का धर्य बाँध टूटा
    एक छलांग से कूदान मार
    बाहों में आ गई प्रियतमा
                   -●-

रविवार, 10 मार्च 2019

मनोज के अनमोल वचन

   

            कवि : मनोज कुमार साहु

                               ओड़िशा 

 - गलतफहमी -


  गलतफहमी एक ऐसी बीमारी है
  जिसका इलाज नहीं होता
  गलतफहमी के मकड़जाल में
  शैतान का बच्चा घर कर लेता है
               •••

 - इल्जाम -


  इल्जाम सहना ,
  सर पर भारी पहाड़ उठाना जैसा है।
  और गलत इल्जाम लग गया तो,
  जीना दूभर हो जाता है ।
                •••

 - लालच -


  लालच बुरी बला है , जग ऐसा कहे
  मन काबू में है तो , लालच पास ना आए
                 •••

   - प्यार -


   प्यार सुख की चाबी है
   और हर रोग की दवा
   यह दुनिया तुच्छ है
   सच्चे प्यार के सिवा
            •••

  - फितरत से मजबूर -


   पोथी पढ़ - पढ़ रावण बना
   ढाई अक्षर पढ़ कर कबीरा
   चाकू हाथ में ले डाकू डाले डाका
   जान बचाए डॉक्टर लगाकर चाकू से चीरा
                    •••

   - सीख -


   जंग और मोहब्बत
   उँची शख्सियत से करो
   हार जाने पर भी
   अच्छी सीख मिलती है
              •••

  - खुद्दारी-


  अल्फाजों को जाया मत होने देना
  अपने को बेईमान होने मत देना
  चाहे कितने भी कमजोरी आ जाए खुद में
  अपनी खुद्दारी कभी मत छोड़ना
                 •••

   - शब्द-


  शब्दों से संसार गड़ता हूँ
  शब्द ही अमोघ अस्त्र हैं
  खुशी को गम और गम को खुशी में ,
  बदलने की काबिलियत रखता हूँ ।
                •••


Shayari of Manoj kumar Sahoo

     

        ● शायरी मनोजकुमार साहु की



   ( दर्द )


  दर्द वह नहीं है
  जिससे तुम तड़पते हो
  दर्द वह है
  जिसे सोचने भर से तुम कराहते हो

                  --●--


  ( भूख )


  भूख का मतलब क्या जानोगे तुम अमीरो
  भूख का मतलब उस माँ से पूछो
  जो अपनी कोख में लिए संतान को
  जी तोड़ मेहनत मजदूरी करती है

                 --●--


  ( आँखें )


 तू  लाख इंकार कर पहचानने से
 लेकिन तेरी नादान मासूम आँखें
 कभी भूल नहीं सकती हमें
 आज भी मोहब्बत करती तेरी आँखें हमें

                   --●--


  ( नज़र )


 जब लौटता हूँ
 मैखाने से जाम पीकर
 सब भूल जाता हूँ
 सिवाय तेरी तिरछी नज़र

       --●--


 ( आशिक )


हम भी मशहूर आशिक हैं
लेकिन नहीं हैं किस्से हमारे
लोगों के जवान पर
सारा इल्जाम लगाता हूँ ज़माने पर

               --●--


  ( मशहूर )


 हीर - रांझा, श्री - फरियाद मशहूर हुए
 हम तुम मशहूर हुए नहीं
 क्योंकि मोहब्बत पर इल्जाम,
 या सरकार का कोई पहरा नहीं

               --●--


    ( मरहम - मर हम )


   दिल के टुकड़े टुकड़े करके
  'मरहम' लगाने आए हो
   जिंदा हैं या 'मर हम' गए
   यह देखने, बहाना करके आए हो
               --●--

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     🙏💞

    धन्यवाद पाठको !


शुक्रवार, 8 मार्च 2019

शायरी मनोज कुमार साहु की



        शायर : मनोज कुमार साहु


  ( ज़हर )


 ज़हर वह नहीं है
 जिसे पीकर खुदकुशी की जाती है
 बेशक ज़हर वह है
 जिससे दिल मर जाता है


 ( आईना )


 सुना है आईना कभी झूठ नहीं बोलता
 लाख शुक्रिया खुदा की
 क्योंकि आँखों की पुतलियों में
 खुदा तूने आईना दे दिया

  ( होंठ )


  होंठ इतने खूबसूरत क्यों हैं पता है ?
  माशूक़ को रिझाने के लिए ?
  हरगिज़ नहीं
  मीठे लब्ज बोलने के लिए ।






गुरुवार, 7 मार्च 2019

शायर : मनोज कुमार साहु

   

      शायर  : मनोज कुमार साहु

  ( बेवफ़ाई )


      बेवफाई तो इस कदर है
      सोचे थे -
 गुजारेंगे ताउम्र जिसके साथ
 उसे तो बेवफाई की बीमारी है
             --●--

   ( भँवरे माशूक़ )


 रे भँवरे माशूक !
                तुझे क्या पता ?
 हम वह नगीना हैं -
               जिसे सिर्फ जोहरी  पहचान सकता है ।
                       --●--

    ( मोहब्बत )


 मोहब्बत वह चीज है
 उसका कोई मोल नहीं है
 मोहब्बत की खरीद फरोख्त करने वाले
 इंसान कहने लायक नहीं है ।

               --●--

मंगलवार, 26 फ़रवरी 2019

पाकिस्तान तू भूल गया

 

                  कवि मनोज कुमार साहु


  पाकिस्तान तू भूल गया !
  65 ,71 और 1999 में
  तेरा हश्र क्या हुआ था भूल गया
  ताशकंद समझौता, बांग्लादेश जन्म, कारगिल
  पाकिस्तान तू भूल गया !

  जब फील्ड मार्शल मानेकशॉ और
  सिर्फ 3 हज़ार भारतीय सैनिकों के आगे
  पाकिस्तान जनरल नियाजी घुटने टेके ,
  तेरे 25 हज़ार सैनिकों की
  प्राण भिक्षा, तू भूल गया !

  नेहरू जी के श्वेत कबूतर
  इंदिरा जी का दुर्गा रूप
  अटल जी की बस यात्रा
  पाकिस्तान तू भूल गया !

   पाकिस्तान मत सोच
   बार-बार कायराना हरकत करेगा
   हम पकड़े हैं हाथ में श्वेत झंडा
   इसका मतलब यह नहीं
   आतंकी हमला कराएगा
   एक बार हमारा दिमाग फिर गया तो
   पाकिस्तान आग की भट्टी में चला जाएगा
   पाकिस्तान तू भूल गया !

   हम अमन परस्त हैं
   भारतीय युद्ध करना
   और जीतना जानते हैं
   पाकिस्तान तू भूल गया !

   65, 71, 99 को याद कर
   ख़ौफ तेरे ज़हन में आ जाएगा
   इससे तू नहीं सुधरा
   तेरे लिए माकूल जवाब
   घर में घुसकर
   लाहौर तक बमबारी करती
   भारतीय सेना के पराक्रम
   पाकिस्तान तू भूल गया !
   पाकिस्तान तू भूल गया !
           •••●•••

रविवार, 24 फ़रवरी 2019

वंदे भारत माता

               

       

                   कवि मनोजकुमार साहु 

  वंदे भारत माता
  वंदे भारत एकता
  वंदे तिरंगा झंडा
  वंदे भारत की अखंडता
  वंदे भारतीय सेना
  वंदे शहीद जवाना
  वंदे भारत की वीरता
  वंदे स्वतंत्रता सेनानी और स्वाधीनता
  वंदे संविधान निर्माता - राष्ट्रपिता
  वंदे धर्मनिरपेक्षता
  वंदे भारत माता
  वंदे भारत माता

प्रियतमा (16)

  कवि मनोज कुमार साहु


        हालत नाजुक देखकर उसकी
        मेरे दिल में कुछ-कुछ हुआ
              हिलोरे मारे
              मन समंदर
        पास जाकर उसका बैठा
              हाथ बढ़ाया
              छूने के लिए
       शर्म से लथपथ नवल प्रियतमा ।

                 ●●●●●●●


प्रियतमा (17)


विवेक कहता था 
हट जा दूर 
   मत छू वह है ज्वाला 
    मन कहता था -
   तोडूँगा जंजीर ,
रोक सकता तो रोक के दिखला 
       किंकर्तव्यविमूढ़ आशिक थरथरा गया 
    हारा विवेक जीती नवोढ़ा प्रियतमा ।

●●●●●●●

प्रियतमा (18)

         अडिग विवेक सफरा बन
         सीमा लांघने ना दिया
         हथेली पकड़ प्रेमिका की
         सहसा छोड़े प्रियवर 
         अपने हाथ को चूम - चूम कर 
         गाढ़ दिए उस पर 
         दौड़ गई बिजली ,बंध गई शमा
         क्या करती बिचारी बेबस प्रियतमा ।



शनिवार, 26 जनवरी 2019

प्रियतमा 15

          प्रियतमा (15)

 कवि मनोज कुमार साहु


  पागल मजनू -
  दीवाना बन ,
  फिरता रहा मारा मारा ।
  एकांत पाया एक दिन उसे 
  आस लगाकर जा बैठा ।
  नजर नीची 
  नाखून कुतरती 
  खामोश थी प्रियतमा ।

Priyatama 14

                  प्रियतमा (14)

                कवि मनोज कुमार साहु

  बीते दिन बीती रातें अनगिनत 
  नहीं था ठोर ठिकाना ।
  आया लम्हा ऐसा 
  निकट जाकर बैठा पास 
  बातों बातों में दिल में उतरा ,
  हँस दी मेरी दिलरुबा तब 
  मालूम पड़ा पहले से 
  सब जानती है प्रियतमा ।

सोमवार, 21 जनवरी 2019

इंसान तू सोच

                इंसान तू सोच !

                 कवि मनोज कुमार साहु

 इंसान तू सोच !
 क्यों जन्मा है धरती पर
 क्या कर रहा है धरती पर
 क्या पाया है धरती  से
 और क्या कमा कर जाएगा धरती पर ???

 इंसान तू सोच !
 क्यों लड़ रहे हैं लोग आपस में
 क्यों दौड़ रहे हैं धन के पीछे
 शादियों से ऐसा क्यों होता है
 जबकि सबको मिलना है मिट्टी में

 इंसान तू सोच !
 दुनिया में सबसे कीमती क्या है,
 क्या यश कीर्ति प्रेम नहीं है,
 तो उसके लिए क्या कर रहा है ?
 कहीं खराब ना हो जाए यह जन्म ध्यान रहे ।

 इंसान तू सोच !
 घमंड विद्वत्ता को खा जाता है ।
 ईर्ष्या इंसान को,
 चाटुकारिता पुरुषार्थ को,
 इन से तौबा करना बुद्धिमानी है ।

  इंसान तू सोच !
  तुझे सोचना पड़ेगा
  क्योंकि तू इंसान है,
  श्रेष्ठ गुण तेरे रग रग में है
  क्योंकि तू इंसान है ।

गुरुवार, 27 दिसंबर 2018

विडंबना

                    बिडंबना 

                कवि मनोज कुमार साहु

 सबसे बड़ा दौलत संतोष है
 लेकिन नफरत की खेती करने में सब उतारू हैं
 आजकल की दुनिया में
 हर देश , हर इंसान 
 अपने पड़ोसी को हथियार के बल पर
 डराना चाहता है
 पड़ोसी भी कहां पीछे है
 विडंबना ऐसी है
 ईंट का जवाब
 तोप से देने पर आमादा है ।

 सबसे बड़ी त्रासदी 
 दुनिया में युद्ध है
 आज हर देश
 तोप बंदूक मिसाइलों के दम पर
 अपने को ऊंचा दिखाने पर आमादा है
 खुद निजात करता है विनाशकारी अस्त्र
 सामने वाले को अहिंसा का पाठ पढ़ाता है
 विडंबना ऐसी है
 समूची दुनिया
 बारूद के ढेर पर बसी है ।

 सबसे नायाब प्राणी मनुष्य है
 लेकिन विडंबना यह है
 विनाशकारी युद्धास्त्र एकत्र से
 किसका भला करना होना है ?
 अमेरिका रूस चाइना भारत फ्रांस
 और तमाम देशों के
 असलहा केवल
 मानवता के सर पर मंडराता
 काल रूपी गिद्ध है
 विडंबना ही विडंबना है ।.





गुरुवार, 29 नवंबर 2018

" अंधा युग " धर्मवीर भारती

   " अंधा युग " धर्मवीर भारती

प्रस्तुतकर्ता : मनोजकुमार साहु

मशहूर साहित्यकार धर्मवीर भारती हिंदी के प्रसिद्ध हस्ताक्षर हैं। उनका जन्म 25 दिसंबर 1926 इलाहाबाद, उत्तर प्रदेश में हुआ। उनका निधन 4 सितंबर 1997 मुंबई में हुआ।

 साहित्यिक योगदान कहानी संग्रह -  स्वर्ग और पृथ्वी,बंद गली का आखरी मकान

काव्य - ठंडा लोहा, अनुप्रिया, आद्यांत
उपन्यास - गुनाहों का देवता, ग्यारह सपनों का देश, प्रारंभ व समापन, सूरज का सातवाँ घोड़ा,
निबंध - ठेले पर हिमालय

मंगलवार, 27 नवंबर 2018

आज भी मुझे याद है ( 1 )

               आज भी मुझे याद है ( 1 )


                कवि मनोजकुमार साहु

         आज भी मुझे याद है -
         एक एक लफ़्ज़,
         महसूस कर रहा हूँ
         तलफ्फुज़ तुम्हारी ।
         जिसे सुनकर ,
         तार - तार होता था
         मेरा मन। 
         मैं हो उठता था व्याकुल ।
         तब तुम्हीं ने तो
         संभाला था मुझे ;
         अपने बाहों में जकड़ कर। 
         दुनियादारी समझाई थी तब ।
         कैसे भूल सकता हूँ
         तुम्हें और वह स्वर्णिम पल ?

भाषा के विविध रूप

भाषा के विविध रूप -

1 - मूल भाषा 

भाषा का यह भेद इतिहास पर आधारित है ।भाषा की उत्पत्ति अत्यंत प्राचीन काल से हुई होगी । जहाँ बहुत से लोग एक साथ रहते होंगे । ऐसे स्थानों में किसी एक स्थान की भाषा जो आरंभ में उत्पन्न हुई होगी , तथा आगे चलकर जिससे ऐतिहासिक और भौगोलिक आदि कारणों से , अनेक भाषाएँ , बोलियाँ तथा उपबोलियाँ आदि बनी होंगी । मूल भाषा कही जाएगी - उदाहरण के लिए हमारी मूल भाषा भारोपीय भाषा परिवार की भाषा कहलाई ।

2 -  व्यक्ति बोली 

भाषा के इस लघुतम रूप में एक व्यक्ति की भाषा को व्यक्ति बोली कहा जाता है । वैज्ञानिक दृष्टि से देखा जाए तो मनुष्य के हर क्षण बदलते रहने के साथ ही उसकी बोली में भी परिवर्तनशीलता आ जाती है । जन्म से लेकर मृत्यु तक की किसी व्यक्ति की बोली को व्यक्ति भोली कहा जाता है । उदाहरण स्वरुप कोई व्यक्ति अगर अंधेरे में भी बात करता है तो उसकी बोली से हम उसे पहचान लेते हैं।

3 - उप बोली या स्थानीय बोली 

भाषा का यह रूप भूगोल पर आधारित है। एक छोटे से क्षेत्र में बहुत सी व्यक्ति बोलियों का सामूहिक रूप स्थानीय बोली या उप बोली कहलाता है। अंग्रेजी में इसका डायलेक्ट् से सब डाइलेक्ट शब्द चलता है । इस आधार पर उप बोली शब्द ठीक है ।उप बोली का यह रूप बोली से अपेक्षाकृत छोटा होता है । उप बोली साधारण सा समाज के मध्य वर्ग या निम्न वर्ग की बोली होती है ।इसमें साहित्य भी मिलती हैं।

4 - बोली 

बोली शब्द अंग्रेजी के डायलेक्ट का प्रतिशब्द हैं ।भाषा विज्ञान की दृष्टि से इसे उपभाषा या प्रांतीय भाषा कहते हैं। एक भाषा के अंतर्गत कई बोलियाँ आती है।

5 - विभाषा 

जब कोई बोली किन्ही कारणों से धार्मिक श्रेष्ठता, भौगोलिक विस्तार अथवा उच्च साहित्यिक रचनाओं के आधार पर सामग्र प्रांत या उपरांत में प्रचलित होती हुई साहित्यिका आधार ग्रहण कर लेती है, तो वह  विभाषा या उपभाषा कहलाने लगती है। यह अपने उच्चारण, व्याकरण, रूप एवं शब्द प्रयोग की दृष्टि से परिनिष्ठित तथा साहित्यिक भाषाओं से भिंन्न होती है। जैसे अवधि ,मैथिली ,बंगाली, ओड़िया आदि ।

6 - परिनिष्ठित भाषा 

इसे टकसाली भाषा भी कहा जाता है। यह उच्चारण तथा व्याकरण की दृष्टि से स्थिर व निश्चित होती है। शिक्षित वर्ग के लोगों के लिए शिक्षा, व्यवहार, पत्र व्यवहार, समाचार पत्र आदि की भाषा होती है, दूरदर्शन, फिल्म निर्माण ,पत्र पत्रिकाएँ, पत्राचार इस भाषा में होते हैं ।

7 - साहित्यिक भाषा 

जिसका प्रयोग साहित्य में होता है। बोलचाल की भाषा की तुलना में प्रायः कुछ कम विकसित, कुछ अलंकृत, कुछ कठिन तथा कुछ परंपरा अनुसार होता है। इसे काव्य भाषा भी कहते हैं।

8 - राजभाषा 

जो भाषा देश के प्रशासनिक, वैधानिक कार्य में प्रयुक्त होती है, अर्थात जिसका प्रयोग राज्यों के कामों में होता है। वह राष्ट्रभाषा कहलाती है ।उदाहरण स्वरूप संवैधानिक मान्यता के अनुसार हिंदी भारत की राष्ट्रभाषा न होकर राजभाषा है।

9 - राष्ट्रभाषा 

राष्ट्रभाषा उस भाषा को कहते हैं जो देश के बहुसंख्यक लोगों द्वारा न केवल बोली जाती है, वरन् समझी जाती है। समूचे राष्ट्र की धड़कन कहे जाने वाली राष्ट्रभाषा को राष्ट्र का संपूर्ण जन जीवन एवं संस्कृति धड़कती है। राष्ट्रभाषा राष्ट्र की संस्कृति एवं सभ्यता की पहचान होती है।

10 - अंतर्राष्ट्रीय भाषा 

अंतर्राष्ट्रीय भाषा को विश्व भाषा भी कहते हैं। जो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर व्यापार, पत्र व्यवहार, विचार विनिमय, व्यवसाय आदि क्षेत्र में प्रचलित होती है ।जैसे अंग्रेजी भाषा अंतरराष्ट्रीय भाषा है। हिंदी अब इस राह पर तेजी से चल रही है।

11 - विशिष्ट भाषा 

विशिष्ट भाषा विभिन्न वर्गों की अलग-अलग भाषाएँ हो जाती है। भाषा विभिन्न रूपों में होती है। जैसे व्यापारियों की भाषा, विद्यार्थियों की भाषा, धार्मिक संस्थाओं की भाषा। इस भाषा पर विभिन्न भाषाओं शब्दों का प्रभाव होता है। जैसे लोहार की भाषा में उसके शब्द होते हैं, बनिए की भाषा में उसके शब्द होते हैं, इंजीनियर की भाषा में उसके शब्द होते हैं, मौलवी की भाषा में उसके शब्द होते हैं ।

12 - मातृभाषा 

मातृभाषा मनुष्य को जान्म के साथ ही अपनी माता से प्राप्त होती है। जिसे वह घर पर ही सीखता है।अर्थात जिस भाषा को कोई बालक अपनी माता के दूध के साथ संस्कारों में प्राप्त करता है। वह मातृभाषा कहलाती है।

13 - लिखित भाषा 

 लिपि का विकास अभिव्यक्ति के क्षेत्र में बहुत बड़ी क्रांतिकारी घटना थी, जिससे मनुष्य को अपने विचारों एवं भावों को चिरकाल तक सुरक्षित रखने का सुगम पथ प्रशस्त किया। वह अपने भावों एवं विचारों को लिपिबद्ध करके चिरस्थाई बनाने की कला जान गया था। वस्तुतः यदि लिपि का विकास न हुआ होता तो मनुष्य का सुसभ्य एवं सुसंस्कृत होना बड़ा ही कठिन था। वेद हो या रामायण या बाइबिल किसी भी भाषा में लिखी गई कोई विषय सामग्री। भाषा के लिखित रूप ने इसे संचित करने का शाश्वत उपाय ढूँढ लिया।

14 - अंगिक भाषा 

 अंगिका भाषा में मनुष्य अपने विचारों एवं भावों की अभिव्यक्ति वाणी द्वारा नहीं करता वरन् उसे अपने हाथ पैर मुख नाक आँख आदि आंगिक अंगों की चेष्टाओं और संकेतों पर ही निर्भर करना पड़ता है। इसे अंगिक भाषा कहा जाता है

15 - वाचिक भाषा

वाचिक भाषा में मनुष्य बोलकर अपने अपने भावों की अभिव्यक्ति करता है। इस वाचिक भाषा के भाव संप्रेषण की असीमित संभावनाएँ प्रकट हो गई। आंगिक भाषाओं की सीमित अभिव्यक्ति के फलस्वरूप वाचिक भाषा की खोज मानव जगत की सबसे बड़ी क्रांतिकारी उपलब्धि थी।

16 - यांत्रिक भाषा 

 यांत्रिकी भाषा यंत्रों द्वारा संचित होती है। यंत्रों के आविष्कार के कारण मनुष्य जिसे जब चाहे सुन सकता है। उदाहरण स्वरुप टेप रिकॉर्डर, मेमोरी चिप इत्यादि। 

 ( मनोजकुमार साहु, मोबाइल नं 9040981373 संपर्क करें )

भाषा क्या है ?

भाषा क्या है ?

भाषा शब्द संस्कृत के 'भाषʼ धातु से बना हुआ है ।इसका अर्थ होता है बोलना । इस प्रकार इस का सामान्य अर्थ है अपने विचारों या भावों को प्रकट करना । भाषा अपने सामान्य अर्थ में विचारों या भावों को आदान प्रदान करने का माध्यम है । हम अपने विचारों या भावों को कई बार संकेतों या इशारों से भी व्यक्त करते हैं । जैसे कोई मूक व्यक्ति या गूंगा व्यक्ति किसी से कुछ बोलता है तो वह इशारों से समझाने की कोशिश करता है। ठीक उसी प्रकार रेल विभाग में हरा और लाल रंग का प्रयोग होता है झंडा या लाइट के रूप में ।
                              अतः सामान्य अर्थ में भाषा हमारे विचारों के आदान-प्रदान या विचार विनिमय का एक माध्यम है ।

भाषा के संबंध में कुछ प्रमुख विद्वानों ने जो परिभाषाएँ दी हैं वह इस प्रकार हैं -

1 : मनोज कुमार साहु के अनुसार -

मानव मुख से प्रयत्न पूर्वक उच्चरित सार्थक यादृच्छिक ध्वनि प्रतीकों की वह व्यवस्था जिसके द्वारा शत प्रतिशत भाव विनिमय हो जाए उसे भाषा कहते हैं ।

2 : डॉक्टर बाबूराम सक्सेना के अनुसार -

भाषा अभिव्यक्ति का माध्यम है और एक ऐसी शक्ति है, जो मनुष्य के विचारों, अनुभव और सुंदरसंदर्भों को व्यक्त करती है । इसके साथ उन्होंने यह भी कहा है कि जिन ध्वनि चिन्हों द्वारा मनुष्य परस्पर विचार विनिमय करता है । उसकी समष्टि को भी भाषा कहते हैं ।

3 : डॉ भोलानाथ तिवारी के अनुसार -

भाषा उच्चारण अवयवों से उच्चरित मूलतः यादृच्छिक ध्वनि प्रतीकों की वह व्यवस्था है जिसके द्वारा समाज के लोग आपस में विचारों का आदान-प्रदान भी करते हैं ।

इन परिभाषाओं के आधार पर स्पष्ट होता है कि भाषा का कार्य है - मानवीय कार्यों को समझने में सहायता देना । भाषा मानव मुख से निकली हुई सार्थक ध्वनि संकेतों का समष्टि गत रूप है । जिसमें उच्चारण अवयवों का विशेष महत्व है । विवेध संकेतों या हाव भाव को भाषा का पूर्ण रूप नहीं कहा जा सकता है । भाषा तो एक विज्ञान है ।एक सामाजिक क्रिया है । वक्ता और श्रोता के बीच विचार विनिमय का साधन है । इस आधार पर भाषा मानव मुख से निकली हुई सार्थक ध्वनियों का समूह है । केवल भावों या संकेतों को भाषा कहना सही नहीं होगा ।

भाषा की विशेषताएँ -

1 : भाषा विचार संप्रेषण भाव संप्रेषण का माध्यम        है ।
2 :भाषा अर्जित संपत्ति है ।
3 : भाषा का रूप परिवर्तन फील होता है ।
4 : भाषा का क्षेत्र व्यापक होता है ।
5 : भाषा परंपरागत रूप से व्यवहृत होती है । इस        तरह इसका प्रवाह नैसर्गिक हैं ।
6 : भाषा भौगोलिक रूप से स्थानीकृत होती है ।
7 :  भाषा सार्थक ध्वनि संकेतों का सामष्टिगत             रूप है ।
9 : भाषा किसी भी देश के जनजीवन व उसकी         संस्कृति की पहचान होती है ।
10 : भाषा का अपना संरचनात्मक ढाँचा होता है ।
11 : भाषा जटिलता से स्थूलता की ओर तथा                स्थूलता से सूक्ष्मता की ओर जाती है ।

शनिवार, 24 नवंबर 2018

प्रेरणा ले सकते हो

                 प्रेरणा ले सकते हो

     

               कवि मनोजकुमार साहु 


     जब कभी भी तुम      
     थक जाते हो,
     अपनी जिंदगी में ,
     तब एक शिशु से
     प्रेरणा ले सकते हो ।
     वह कैसे बार-बार
     गिर गिर कर
     उठ उठ कर
     चलना सीखता है ।
     लेकिन हौसला
     नहीं हारता है ।
     क्योंकि उसे डर नहीं है,
     हारने गिरने ;
     चोट लगने का
     बस उसे तो सिर्फ
     चलना है खड़ा होना है
     अपने पैरों पर ।
     तो तुम क्यों
     इतने समर्थ होकर भी
     डरते हो गिरने से,
     चोट लगने से,
     खड़ा होने से ?

 जब कभी भी तुम 
 असफल होते हो,
 अपनी जिंदगी में ।
 तब एक मूर्तिकार से
 प्रेरणा ले सकते हो ।
 वह कैसे 
 अपनी छैनी हथौड़ी से
 बार-बार करता है प्रहार
 शुष्क पाषाण पर ?
 और उसे देता है रूप
 अपने मनमाफिक ।
 चोट खाता हुआ उंगली पर
 पसीना पोंछता हुआ;
 भूख प्यास भूल कर,
 एक पत्थर को
 करता है जीवंत ।
 तुम क्यों डरते हो
 असफलता से,
 हार से,
 परिश्रम से ?


     जब कभी भी तुम
     टूट जाते हो
     अपनी जिंदगी में 
     तब कुंभार की
     उस मिट्टी से,
     प्रेरणा ले सकते हो ।
     कैसे बार बार टूट कर भी
     बिखर नहीं जाती है ।
     वह गोंदी हुई मिट्टी,
     एक साथ रहती है ।
     उसे जितना गोंदो
     जितना मसलों,
     और ज्यादा निखर जाती है ।
     मूर्ति से लेकर
     दीपक बनने की शक्ति
     उसमें होती है ।
     तुम में भी उससे
     कहीं ज्यादा शक्ति है ।
     तो तुम क्यों डरते हो
     टूटने से,
     गूंद ने से,
     निखरने से ?


सोमवार, 19 नवंबर 2018

व्यर्थ है


                   व्यर्थ है

                     कवि मनोजकुमार साहु

      जिस युद्ध में -

      धर्म नहीं,

      न्याय नहीं,

      क्षमा नहीं

      वह युद्ध व्यर्थ है ।


      जिस जीत में -

      विनय नहीं,

      धैर्य नहीं,

      प्रेम नहीं

      वह जीत व्यर्थ है ।


      जिस जीवन में -

      संघर्ष नहीं,

      प्रतिष्ठा नहीं,

      पुरुषार्थ नहीं

      वह जीवन व्यर्थ है ।


      जिस मनुष्य में -

      चरित्र नहीं,

      लोकाचार नहीं,

      कर्मठता नहीं

      वह मनुष्य व्यर्थ है ।


      जिस नारी में -

      नम्रता नहीं,

      कोमलता नहीं,

      लोक लाज नहीं

      वह नारी व्यर्थ है ।


      जिस पुरुष में -

      बुद्धि नहीं,

      दम नहीं,

      वीरता नहीं

      वह पुरुष व्यर्थ है ।


      जिस गुरु में -

      आदर्श नहीं,

      प्रेरणा नहीं,

      ज्ञान लिप्सा नहीं

      वह गुरु व्यर्थ है ।


      जिस शिष्य में -

      साधना नहीं,

      कृतज्ञता नहीं,

      अहं विरहित नहीं

      वह शिष्य व्यर्थ है ।।

तर्पण

                   तर्पण                  ©️  मनोज कुमार साहु  ​जो वतन के वास्ते अपनी जाँ न्यौछावर कर गए, हँसते-हँसते मातृभूमि...